रिश्ता शर्मसार, डॉ. प्रेम दास के निधन पर नहीं आईं बेटियां, 48 घंटे मोर्चरी में पड़ा रहा शव

News Desk (चंदन शर्मा) : हजारीबाग शहर के मशहूर सर्जन रहे डॉ. प्रेम दास के निधन से अधिक चर्चा उनके बेटियों की निधन की सूचना दिए जाने के बावजूद नहीं आने की है। ऐसे में उनकी लाश अपनो के आने की आस में 48 घंटे से अधिक मोर्चरी में पड़ी रही। मानवता को शर्मसार करने वाली यह खबर इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल है। अपनों के इंतजार के बाद 77 वर्षीय डॉक्टर प्रेमदास का अंतिम संस्कार उनकी पत्नी प्यारी सिन्हा और कुछ साथी चिकित्सकों ने अज्ञात लाशों का दाह संस्कार करनेवाले समाजसेवी नीरज कुमार की मदद से खिरगांव शमशान घाट पर कराया। चंद महीने पहले भी ऐसी ही एक खबर बनारस के चर्चित साहित्यकार और 80 करोड़ की संपत्ति के मालिक रहे श्रीनाथ खंडेलवाल के निधन के समय भी आई थी। अब एक बार फिर यह चर्चा जोर पकड़ने लगी है कि क्या पारिवारिक संस्कारों का अब हमारे समाज में कोई महत्व नहीं रह गया है, जो ऐसी घटनाएं बार-बार देखने सुनने को मिल रही है।
हजारीबाग के विख्यात सर्जन थे डॉ. प्रेम दास
77 वर्षीय डॉ. प्रेम दास एक विख्यात सर्जन थे। उनके द्वारा इलाज किए गए हजारों मरीज आाज सुखमय जीवन व्यतित कर रहे हैं। डॉ. प्रेम की दो बेटियां हैं। एक अमेरिका में रहती है तो दूसरी मुंबई में। उनके अन्य नाते-रिश्तेदार बिहार-झारखंड में भरे पड़े हैं। दोनों बेटियों को उनके निधन की सूचना फोन पर दी गई। अमेरिका से ण्क बेटी नहीं आई तो दूसरी बेटी के बीमार होने की खबर मुंबई से आ गई। अन्य नाते-रिश्तेदार भी नहीं आए। ऐसे में थक-हारकर पत्नी प्यारी सिंहा ने कुछ लोगों के सहयोग से उनका अंतिम संस्कार कराया।
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सोशल मीडिया पर पोस्टस् में लोगों ने लिखा, दुःखद और अंतर्मन को झकझोरनेवाली खबर। आज लोग कितना खुदगर्ज होते जा रहे हैं। लोग खुद में सिमट रहे हैं,जिससे नाते- रिश्ते सब पर विराम लग रहा है। रिश्ते मर रहे हैं, तभी तो ऐसी घटनाएं आ रही हैं। यह खबर रुलाने वाली है, क्योंकि अपने जिन बच्चों को बड़ा करने पढ़ाने- लिखाने और उन्हें उनके मुकाम तक पहुंचाने में मां- बाप जीवन भर यज्ञ करते हैं, कुछ परिवार में उसका फल ऐसा कटु भी मिलता है। वैसे ऐसी कहानी की आज भरमार है। हजारीबाग क्या, राज्य और देश क्या, महानगरों की चकाचौंध में सैकड़ों बच्चे अपने बूढ़े मां- बाप को छोड़कर फुर हो चुके हैं, अपनी पत्नी और बच्चों के साथ। यह भूल चुके हैं कि जैसी फसल लगाएगें, वैसी काटेंगे। उनके बच्चे भी वही करेंगे आगे चलकर।
वाराणसी के साहित्यकार श्रीनाथ खंडेलवाल के निधन पर भी नहीं आए थे बेटा-बेटी
चंद महीने पहले वाराणसी (बनारस) से भी ऐसी ही एक कहानी सामने आई थी। वहां कभी अपनी लेखनी से साहित्य जगत में खासे चर्चित रहे और 80 करोड़ की संपत्ति के मालिक रहे वाराणसी के साहित्यकार श्रीनाथ खंडेलवाल की संपत्ति पहले उनके बेटे-बेटी ने हथियाई, फिर उन्हें वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर किया। और जब 30 दिसंबर को उनका निधन हुआ तो भी बेटा-बेटी अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुए। ऐसे में उनका अंतिम संस्कार समाज के कुछ लोगों को करना पड़ा। उनके निधन के बाद भी इस चर्चा ने जोड़ पकड़ा था कि क्या पारिवारिक संस्कारों का अब हमारे समाज में कोई महत्व नहीं रह गया है।
श्रीनाथ खंडेलवाल ने लिखी थी 400 से अधिक किताबें
श्रीनाथ खंडेलवाल ने 400 से भी अधिक किताबें लिखीं थीं। जिस जमाने में आज की तरह इंटरनेट या ऑनलाइन जैसे प्लेटफॉर्म नहीं थे, तब भी उनकी किताबें बड़ी संख्या में बिका करतीं थीं और चर्चा के केंद्र में रहा करतीं थीं। आज भी उनकी किताबें बड़ी संख्या में बिक रहीं हैं। साहित्य जगत से उनका जुड़ाव बचपन में ही हो गया था। इन्होंने अपनी पहली किताब मात्र 15 वर्ष की आयु में ही लिख दी थी। ये पद्मपुराण, 2000 पन्नों का मत्स्य पुराण, तंत्र पर करीब 300 पन्नों की किताबें लिखने के लिए खासे मशहूर थे। इनकी कुछ किताबें तो अभी भी छप रही हैं। इन्होंने शिवपुराण का पांच खंडों में अनुवाद किया। असमिया और बांग्ला भाषा के अनुवादक के तौर पर भी इनकी एक विशेष पहचान थी। लगभग 21 उपपुराण और 16 महापुराणों का अनुवाद इन्होंने अपने लेखन काल में किया। कई किताबें उन्होंने वृद्धाश्रम में रहते हुए लिखीं। किताबों की बदौलत ये 80 करोड़ की संपत्ति के मालिक बने थे।
क्या खत्म हो रहा सामाजिक ताना-बाना, मर रही संवेदना?
हाल के दिनों में सामने आईं ऐसी कुछ घटनाओं के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या हमारे समाज का सामाजिक ताना-बाना खत्म हो रहा है, क्या हमारी संवेदनाएं मर गई हैं? लोगों ने लिखा कि ऐसी सूचनाएं हमें न केवल वर्तमान समय में सोचने को मजबूर कर रहीं हैं, बल्कि इस पर सवाल खड़ा कर रहीं हैं कि क्या बच्चों को ज्यादा पढ़ाना-लिखाना, काबिल बनाना कहा तक जायज है। जिन्हें बुढ़ापे में सहारा बनना होता है, उनका संवेदना शुन्य हो जाना इस प्रगतिशील होते समाज पर एक काले धब्बे सा है। इसे सामाजिक ताने-बाने के बिखरने और संवेदनाओं के खात्मे की और अग्रसर होने की शुरुआत के रूप में देखने की जरूरत है।
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