कविता – यह कैसी उजियारी

तमस यथावत बना रह गया,
जीवन की दुश्वारी।
राम ,रहीम का सौदा होता,
राजनीति से यारी ।
फुटपाथों पर वही भीड़ है,
प्लास्टिक के आवास।
मां भूखी रह दूध पिलाती
सिसक रही है सांस।
अस्पताल में भीड़ लगी है,
पैसे बिना न दवाएं।
अगनित रुपए फीस है भैय्या,
दवा कहां से लाएं।
खोरा और कटोरा लेकर,
चला रहे स्कूल ।
मिड डे मील में घपला होइगा,
कहीं हो गई भूल ।
थाना और अदालत में तो,
सिसक रहा है न्याय।
आंकड़ों की है बाजीगरी,
कहीं नहीं अन्याय।
ऊपर से सब ठीक-ठाक है,
गिरवी प्रेस का कहना।
भीख मांगने न्याय चली है,
बिक गया सारा गहना।
दूध पी रहे सभी राज्य में,
चाटुकार हैं कहते।
चमचा भी मदमस्त घूमता,
राम राज्य के बूते।
दारू की बोली लगती है,
पानी ही है दूध ।
गुंडो व पैसों के बल पर,
विजय मिली हर बूथ।
कोचिंग में ही पढ़ाई होती,
प्राइवेट में ज्ञान।
सरकारी विद्यालय केवल,
सेमल फूल मकान।
बने हुए हैं सभी डस रहे ,
अच्छे हैं कानून।
भारतेंदु की लाइन जिंदा,
सस्ता अब भी खून।
आदर्शों की बलि चढ़ती है,
सब करते होशियारी।
तमस अभी भी नहीं जा सका,
यह कैसी उजियारी।
गोपाल त्रिपाठी
शांतिपुरम
प्रयागराज
9889609950
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