नगसर। स्थानीय क्षेत्र में मंगलवार को आर पी स्कूल ढढ़नी में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा में आचार्य श्री राम मनोज त्रिपाठी ने प्रेम की भाषा और प्रेम का जीवन में महत्व पर बहुत सुंदर व्याख्यान दिए। उन्होंने कहा “बिना प्रेम के भक्ति संभव नहीं है।”
भक्ति का मूल आधार ही प्रेम है। जब तक मन में भगवान के प्रति सच्चा प्रेम, लगाव और आत्मीयता नहीं होती, तब तक भक्ति केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाती है।
प्रेम वह शक्ति है जो भक्त और भगवान के बीच अटूट संबंध स्थापित करती है। प्रेम से ही मनुष्य अहंकार, लोभ, क्रोध आदि दोषों से मुक्त होकर भगवान में लीन होता है। जैसे मीरा ने श्रीकृष्ण से, हनुमानजी ने श्रीराम से, या गोपियों ने गोकुल के कान्हा से जो भक्ति की — वह प्रेमपूर्ण थी, निष्काम थी।
जहाँ प्रेम है, वहाँ समर्पण है, और जहाँ समर्पण है, वहीं सच्ची भक्ति है। इसलिए कहा गया है —
“प्रेम बिना भक्ति न होई, प्रेम बिना हरि मिलन न होई।”
कथा की शुरूआत व्यास पूजा गणेश स्तुति के साथ में चालीसा और सरस्वती वंदना के साथ हुआ।
जय गोविंद दुबे, पप्पू तिवारी, जयप्रकाश पांडेय, राना रंजीत बासु, चच्चू मिश्रा, रमेश रसिया ,गोलू बाबा,देवेश तिवारी, लक्ष्मण शर्मा तथा मुख्य यजमान रामप्रवेश पांडेय की उपस्थिति सराहनीय रहा।

